गुरुवार, दिसंबर 25

रात के बाद दिन आता hai



नए सवेरे का स्वागत क्यो न कुछ इस अंदाज में किया jaye

सोमवार, दिसंबर 8

रंगमंच के दर्शकों का अपहरण

नाटक-नौटंकी के सहारे, हंसने-बोलने वाले लोगों के पाँव अब ऑडिटोरियम के बजाय, सिनेमा हाल्स की और जाने लगे हैं. चूंकी बचपन से ही मेरा नाता रंगमंच से रहा है, इसलिए ये कहना अतिस्योक्ती न होगी, की मेरे देखते-देखते रंगमंच के दर्सकों का अपहरण हो गया. और मेरे जैसे कई कलाकार कुछ नही कर पाये. सिनेमा ने जिस गुबार से रंगमंच को कलाकार देना शुरू किया है, उसी प्रवाह से उसने दर्शक भी छीने हैं. देश के हर कसबे में सिनेमा हॉल तो मिल जायेगा, मगर नाटक का मैदान मिले ये जरूरी नही. इसके बावजूद, कई रंगकर्मी आज भी, अपने दर्शकों को छुडाने के जद्दोजहद में लगे हैं.

रविवार, नवंबर 30

किस्सों में शामिल होगी दास्ताँ

काले धुंए के बवंडरों और आग की लपटों के बीच, दहलती, सिसकती मुंबई. फिल्मी आम्चिक मुंबई के ड्यालाग से गूंजने वाली मुंबई की फिजा में इन दिनों दर्द, कराह और चीखों की आहें, पनाह मांग रही हैं. साथ ही पनाह मांग रही हे, उनकी आत्मा. जिन्होंने एक बार फ़िर वतन की खातिर ख़ुद को न्योछावर कर दिया. आज एक न्यूज़ चॅनल ने काफी बहेतरीन तरीके से सहीदों की विजयगाथा से परिचित कराया. आने वाली पीदीयाँ या तो एनीमेशन फिल्मों के कार्टून किरदारों के तौर पर इन्हें जानेगी, या फ़िर वक्त के सिमटने की गर्द इनके इतिहास की किताबों पर चदकर इन्हें किसी संग्रहालय में दर्शनीय बना देंगी.

बुधवार, नवंबर 26

जागते रहो, मौत रात को dastak देती है

जागते रहो, मौत रात को dastak देती है
ना जाने कोई...........कातिल रातों का राज

.1966 में एयर इंडिया का प्लेन क्रेश होने के कारन ११७ लोग मारे गए
.२ डिसेम्बर १९८४ भोपाल गैस कांड.
.२१ माय ११९७ रात ४:३० बजे भूकंप के कारण कई जिंदगी तबाह हो गई.
.२६ जनुअरी २००५ गुज़रात भुज भूकंप
.१६ may २००८ जयपुर सीरियल ब्लास्ट.
.२६ नॉम्वेबेर २००८ रात ९:३० बजे मुंबई में bomb ब्लास्ट.
चाहे बारूद के पीठ पर सवार मौत हो, या जमीन के गुस्से का कहर, ये सोचने वाली बात है की, मौत का तांडव हमेशा रात को ही रचा जाता है. कई ऐसी घटनाएं हैं, जिन्होंने हजारों जिन्दगिओं को रात के अंधेरे में निगल लिया. दोस्तों! ये घटनाएँ सबक दे रही हैं, kee रात सोने को नही, बल्कि जागते रहने को आती है. अगर आज रात १२ बजे के बाद खाकी वर्दी वाला गोरखा आपकी galee में सीटी बजाकर जागते रहो............... की जानकारी न दे, तो भी अपनी सतर्कता में कमी ना आने दें, क्या पता ये रात सुबह का सूरज डूबा दे. क्यूंकि आपकी सुरक्षा आपके अपने हाथ hai

ग़मों को कैश करता मनोरंजन

मर्डर मिस्ट्री में चर्चित हुईं मिस मेरठ के लिए इतनी publicity कम थी, जो अब उन पर फ़िल्म बनाने और उपन्यास लिखने की मंत्रदायें गडी जा रहीं हैं. मनोरंजन के लिए बनने वाली फिल्में अब भावनाओं को कैश कर रही हैं. मोहब्बत, रिश्तों और samaajik विषयों से भरा मनोरंजन इन दिनों, घटना प्रधान जिंदगी बसर कर रहा है. क्या seekh रहे हैं हमारे बच्चों का जुमला जहाँ देशभर में रटा जा रहा है, धार्मिक किस्से-कहानियो के पात्रों को एनीमेशन की रोचकता का jaama पहनाकार बाजार में उतारा जा रहा है, तो ऐसे में प्रियंका-अंजू जैसी ansuljhi मर्डर मिस्त्रियाँ, आरुशी हत्याकांड जैसे तमाम घटनाओं को मनोरंजन बाज़ार में उतारना कितना सही है? मेरठ का मोलीवुड हो या बम्बैया बोलीवुड की नक़ल ही कहा जाए, की निर्देशकों के साथ साहित्यकारों के पास भी लिखने के लिए केवल बिग्बोस के राजा-आशु और मर्डर मिस्ट्री की प्रियंका-अंजू ही रह गईं

मंगलवार, नवंबर 25

भीगी हुई पलकें

भीगी हुई पलकें यह राह ताक रहीं हैं,
की कोई चिन्दिओं का कपडा हमें दे दे,
गम को जो हमने अपना हमराज़ बना लिया है
कर ले वफ़ा या कफ़न का कपड़ा हमें दे दे
ankhein जो आंसूओं का सेलाब बन गई थी
सागर भी कम पडेगा आसमान हमें दे दे
मोती बरस रहे हैं आंखों से जो हमारी
माला बना पहन ले या फंदा हमें दे दे

सोमवार, नवंबर 24

अब मेले में लल्ला लालू

राजनीती से बोलीवुड, बोलीवुड से होलीवुड, मीडिया से जनता और बच्चों से बूढों तक मशहूर हो चुके लालू यादव कुर्सी और संसद छोड़कर इन दिनों सेलामपुर के मेले में छाए हैं. हिन्दुस्तानी भावनाओं को कैश करने वाली चाइनीज कंपनिया आजकल लालू के खिलोनों को मेले में बेच रही हैं. भले ही चाइनीज खिलोने कितने ही हानिकारक हों, मगर बात जब लालू की आती है, तो बच्चे ख़ुद को कैसे रोक सकते हैं. फिलहाल मेले में जमीन पर लगी दुकानों में बैठा लालू खिलोना बच्चों को खूब लुभा रहा है. दुनियाभर में अपने नाम का सिक्का जमा चुके लालू को इस मेले में लल्ला लालू के नाम से पहचाना जा रहा है. जो कहीं बुडिया की दूकान पर अंघूटा चूसते नज़र आ रहे हैं, तो कहीं केवल कच्छा पहने. मिजाज के मुताबिक लालू कहीं-कहीं धोती-बनियान में भी दिख रहे हैं. जो भी हो मगर राबडी की हालत बालम छोटे जैसी है. जो कभी लालू को हेमा के गालों पर फ़िदा पाती हैं, तो कभी सेलामपुर की गोरियों की गोद में खेलते हुए.

रविवार, नवंबर 23

लांचिंग बनाम युद्ध का मैदान

सड़क से गुजरते वक्त किसी इमारत के सामने अगर गज़ब की चिल्ला- चिल्ली सुनाई दे, तो यह मानने में बिल्कुल भी देरी ना करें की यह कोई अखबार का दफ्तार नही है, अखबार के दफ्तर में चिल्ल-पुन होना नया मामला नही है, मगर लांचिंग के दौरान यह चीखा-चाखी पूरे शवाब पर होती है. एक अखबारनवीस होने के नाते मुझे इस माहौल से gujarnaa होता है. लांचिंग के वक्त यह माहौल रणभूमी में फतह पाने से कम नही होता. स्ट्रिन्गेर से प्रिंसिपल रिपोर्टर तक, हर कोई युद्धा की माफिक ख़बर को पहले पेज पर दागने की लडाई लड़ता है.रोज़ की खुशी-गम के साथी लांचिंग के समय, dhusman से कम नही लगते. येही वो समय है, जब उपसंपादक, समाचार सम्पादक और डेस्क पर विराजे बड़े-बड़े सूबेदारों की चांदी होती है. जिंदगी भर हाजिरी की तनख्वाह बटोरने वाले अखबारनवीस भी लांचिंग के समय फोनियाते या आधुनिक टाईपराइटर (keyboard) पर दिन-रात अंगुलियाँ तोडते नज़र आते हैं. चोरी- छिपे बनने वाली ख़बर को गुदड़ी के लाल की तरह छिपाया जाता है. मानो प्रेमी से मिलकर आई प्रेमिका को राज़ खुलने का डर सता रहा हौ. धोके से ख़बर ना छपने या डेस्क से खारिज हौ जाने पर, डेस्क के करता-धरता रिपोर्टर साक्षात यमदूत नज़र आते हैं. इनके बीच संपादक की स्तिथि महाभारत के ध्रात्रास्त्र जैसी होती है. जो इस दौरान कभी हाई, कभी लो रक्तचाप और तनाव जैसी सैकडों bimaariyon का maalik होता है. वही इस samay विज्ञापन विभाग का बड़ा सिक्का hotaa है, जो चित्रगुप्त की तरह विज्ञापन को चिपकाने में मशरूफ होता है.

छोटे छोरे ने मारी बाजी

एक बार फिर गरीबी के दलदल में कला का कँवल खिल गया. पूरे दुनिया के धुरंधर योद्धा उस जंग में शामिल थे, और सबका सपना एक, बिग बॉस का खिताब पाना. मगर लोगों की तमाम मशक्कतों को पछाड़ते हुए सहारनपुर के नाचीज़ छोरे ने फतह हासिल की, और अपने नाम कर लिया बिगबोस का खिताब, saharanapur के छोटे से ढाबे में काम करने वाले इस छोरे का मीडिया की सुर्खियों में आकर पहचान बनाना उन शब्दों को आवाज़ देता है जो यह साबित करते हैं, की सरस्वती पैसे वालों की बपूती नही होती, जो उसे पैसों से खरीदा जाए. एक स्थानीय अखबार में आशु के यह शब्द दिल को चीर गए की, जो आसमान लोग सीडियां लगाकर छूते हैं, मैंने उस आसमान को टांगो पर खड़े होकर छुआ है. सच ही तो है, आशुतोष की कला का जूनून और जीत की जंग ने उसे धुरंधरों की भीड़ में अलग पहचान दी.हालाँकि मेरठइओं के दिलों पर राज करने वाला राजा विजय मुकुट से अछूता रह गया, मगर लोगों के मोहब्बत और pyar ने पहचान का जो ताज उसे diyaa वो काबिले-तारीफ़ है,

शनिवार, नवंबर 15

तमन्ना

तमन्ना है दिल की इतनी उस वक्त जस्न होगा
जब हम फतह करेंगे दुनिया को रश्क होगा
फ़िर महफिलें सजेंगी आलम तो ये ही होगा
इफ्तार की तरह ही जलसा-ऐ- मुल्क होगा
नही हैं हम बेगेरत अकेले हम से कुछ ना होगा
आप और खुदा की नियामत हो तो कैसे कुछ ना होगा
हसरतों को हमारी अंजाम पाना होगा
काबिल है गर हम तो पहचान पाना होगा
hasraton को कोई मेरे रोक ना सकेगा
तमन्ना को हमारी पूरा ही होना होगा,
पूरा ही होना hoga