मंगलवार, नवंबर 25

भीगी हुई पलकें

भीगी हुई पलकें यह राह ताक रहीं हैं,
की कोई चिन्दिओं का कपडा हमें दे दे,
गम को जो हमने अपना हमराज़ बना लिया है
कर ले वफ़ा या कफ़न का कपड़ा हमें दे दे
ankhein जो आंसूओं का सेलाब बन गई थी
सागर भी कम पडेगा आसमान हमें दे दे
मोती बरस रहे हैं आंखों से जो हमारी
माला बना पहन ले या फंदा हमें दे दे

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