रविवार, नवंबर 23
लांचिंग बनाम युद्ध का मैदान
सड़क से गुजरते वक्त किसी इमारत के सामने अगर गज़ब की चिल्ला- चिल्ली सुनाई दे, तो यह मानने में बिल्कुल भी देरी ना करें की यह कोई अखबार का दफ्तार नही है, अखबार के दफ्तर में चिल्ल-पुन होना नया मामला नही है, मगर लांचिंग के दौरान यह चीखा-चाखी पूरे शवाब पर होती है. एक अखबारनवीस होने के नाते मुझे इस माहौल से gujarnaa होता है. लांचिंग के वक्त यह माहौल रणभूमी में फतह पाने से कम नही होता. स्ट्रिन्गेर से प्रिंसिपल रिपोर्टर तक, हर कोई युद्धा की माफिक ख़बर को पहले पेज पर दागने की लडाई लड़ता है.रोज़ की खुशी-गम के साथी लांचिंग के समय, dhusman से कम नही लगते. येही वो समय है, जब उपसंपादक, समाचार सम्पादक और डेस्क पर विराजे बड़े-बड़े सूबेदारों की चांदी होती है. जिंदगी भर हाजिरी की तनख्वाह बटोरने वाले अखबारनवीस भी लांचिंग के समय फोनियाते या आधुनिक टाईपराइटर (keyboard) पर दिन-रात अंगुलियाँ तोडते नज़र आते हैं. चोरी- छिपे बनने वाली ख़बर को गुदड़ी के लाल की तरह छिपाया जाता है. मानो प्रेमी से मिलकर आई प्रेमिका को राज़ खुलने का डर सता रहा हौ. धोके से ख़बर ना छपने या डेस्क से खारिज हौ जाने पर, डेस्क के करता-धरता रिपोर्टर साक्षात यमदूत नज़र आते हैं. इनके बीच संपादक की स्तिथि महाभारत के ध्रात्रास्त्र जैसी होती है. जो इस दौरान कभी हाई, कभी लो रक्तचाप और तनाव जैसी सैकडों bimaariyon का maalik होता है. वही इस samay विज्ञापन विभाग का बड़ा सिक्का hotaa है, जो चित्रगुप्त की तरह विज्ञापन को चिपकाने में मशरूफ होता है.
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