सोमवार, दिसंबर 8
रंगमंच के दर्शकों का अपहरण
नाटक-नौटंकी के सहारे, हंसने-बोलने वाले लोगों के पाँव अब ऑडिटोरियम के बजाय, सिनेमा हाल्स की और जाने लगे हैं. चूंकी बचपन से ही मेरा नाता रंगमंच से रहा है, इसलिए ये कहना अतिस्योक्ती न होगी, की मेरे देखते-देखते रंगमंच के दर्सकों का अपहरण हो गया. और मेरे जैसे कई कलाकार कुछ नही कर पाये. सिनेमा ने जिस गुबार से रंगमंच को कलाकार देना शुरू किया है, उसी प्रवाह से उसने दर्शक भी छीने हैं. देश के हर कसबे में सिनेमा हॉल तो मिल जायेगा, मगर नाटक का मैदान मिले ये जरूरी नही. इसके बावजूद, कई रंगकर्मी आज भी, अपने दर्शकों को छुडाने के जद्दोजहद में लगे हैं.
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