मंगलवार, जनवरी 16

उलझन

ज़िन्दगी में तमाम गुत्थियां भी कुछ ऐसे ही उलझी होती हैं, जिन्हें हम बहुत सुलझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके धागे हर बार एक नई उलझन पहन लेते हैं। उलझन के बीच हमें कामयाबी की वो सोने सी चमक बार बार नज़र आती है, जो हमें साहस देती है। बस थोड़ा और, थोड़ा और। उलझनों के बीच छिपी सफलता, कभी उंगलियों की खाली जगह से झांककर हमें बुलाती है, और नहीं मिटने देती हमारा भरोसा। 

सोमवार, जुलाई 18

striyan

striyan

रविवार, जुलाई 17

कंदील का कातिल कौन, समाज या सोच 
मेरी एक मित्र हैं, जो महिला उत्त्थान के लिए अपनी एक संस्था चलती हैं. आज लंबे वक्त बाद उनका फ़ोन आया और कहने लगी, पाकिस्तान में कितना गलत हुआ, इतनी अच्छी मॉडल कंदील को उसके भाई ने ही मार दिया, हत्यारे को फांसी होनी चाहिए तभी कंदील को न्याय मिलेगा. उनकी बात से थोड़ा देर मुझे भी लगा की यही होना चाहिए लेकिन क्या ऐसे फांसी देने से बदलाव संभव है. फांसी उस हत्यारी मानसिकता को मिलनी चाहिए जिसने महिला की आज़ादी को इस्लाम के खिलाफ समझा है...

ये मेरी अपनी राय है

अपनी यह बात मैंने दोपहर में अपने फेसबुक वाल पर लिखी थी, लेकिन शाम को जब एक चैनल ने कंदील
 बलोच पर स्पेशल कार्यक्रम. में कंदील  बोल रही हूँ दिखाया तो अपनी यह बात  सही मिली, तस्लीमा की पंक्तियों से कंदील के  मन की बात पड़ने की कोशिश  ,लेकिन सवाल वही कायम था. उसने  कहा मेरी  शादी एक ऐसे आदमी से हुई  जो उम्र में मुझसे बड़ा था   ,कंदील खुलकर जीना चाहती थी, लेकिन समाज ने उसके साथ ऐसा किआ  जहाँ से निकलना मुश्किल था, लेकिन उसने हार नहीं मानी  और अपने लिए  वो रास्ता चुना  जिसे वो प्यार करती थी. खुस रहने वाली कंदील तो चली गई लेकिन अपने पीछे सवाल दे गई मेरा कातिल कौन  समाज या सोच 
aj se ek nai shuruaat
lambhe samay se bloging se door thi aj fir blog khola dekha aur kuch naya karne ki koshis ki hai
eis shuruwat mein ap sabhi ka saath chahiye hoga hamesha ki tarah

sukriya

गुरुवार, मार्च 18

एक थी नर्मदा mai


बच्चों आज की कहानी है नर्मदा माई की कहानी जो कभी गौंडवाना साम्राज्य की देवी थी, और बाद में विकास का आहार बन गई। जिसके किनारे बैठ महेश्वर में पत्रकारों के जमावड़े लगते थे, थो कभी रानी अहिल्या के तलवार चमकती थी।
कुछ यूँ किस्से होंगे आज से दस साल बाद जब आगामी फसल को हम महाकौशल की शान और जान नर्मदा माई के बारे में कहेंगे या फिर कोई नदी की तस्वीर दिखाकर उसे नर्मदा बोलेंगे। मुग़ल साम्राज्य और कृष्ण-राधा के किस्सों की माफिक माँ नर्मदा का किनारा भी एक दिन महज किस्से कहानी बन जायेगा.आने वाले पीढियां नर्मदा keशांत तट पर स्वेत धारा नै बाँध देखेंगे।
आपकी अपनी माँ नर्मदा का अस्तित्व जा रहा है और आप चुप हैं कब बोलेंगे जब नर्मदा के तट बांधों से घिर jऐयेंगे उठो और बोलो नर्मदा बचाओ

जो चमकी किस्मत बनकर तेरी
वो आज तुझे पर भारी थी
वो रोती रही महज इसलिए की नर्मदा भी एक नारी thi

गुरुवार, दिसंबर 25

रात के बाद दिन आता hai



नए सवेरे का स्वागत क्यो न कुछ इस अंदाज में किया jaye

सोमवार, दिसंबर 8

रंगमंच के दर्शकों का अपहरण

नाटक-नौटंकी के सहारे, हंसने-बोलने वाले लोगों के पाँव अब ऑडिटोरियम के बजाय, सिनेमा हाल्स की और जाने लगे हैं. चूंकी बचपन से ही मेरा नाता रंगमंच से रहा है, इसलिए ये कहना अतिस्योक्ती न होगी, की मेरे देखते-देखते रंगमंच के दर्सकों का अपहरण हो गया. और मेरे जैसे कई कलाकार कुछ नही कर पाये. सिनेमा ने जिस गुबार से रंगमंच को कलाकार देना शुरू किया है, उसी प्रवाह से उसने दर्शक भी छीने हैं. देश के हर कसबे में सिनेमा हॉल तो मिल जायेगा, मगर नाटक का मैदान मिले ये जरूरी नही. इसके बावजूद, कई रंगकर्मी आज भी, अपने दर्शकों को छुडाने के जद्दोजहद में लगे हैं.

रविवार, नवंबर 30

किस्सों में शामिल होगी दास्ताँ

काले धुंए के बवंडरों और आग की लपटों के बीच, दहलती, सिसकती मुंबई. फिल्मी आम्चिक मुंबई के ड्यालाग से गूंजने वाली मुंबई की फिजा में इन दिनों दर्द, कराह और चीखों की आहें, पनाह मांग रही हैं. साथ ही पनाह मांग रही हे, उनकी आत्मा. जिन्होंने एक बार फ़िर वतन की खातिर ख़ुद को न्योछावर कर दिया. आज एक न्यूज़ चॅनल ने काफी बहेतरीन तरीके से सहीदों की विजयगाथा से परिचित कराया. आने वाली पीदीयाँ या तो एनीमेशन फिल्मों के कार्टून किरदारों के तौर पर इन्हें जानेगी, या फ़िर वक्त के सिमटने की गर्द इनके इतिहास की किताबों पर चदकर इन्हें किसी संग्रहालय में दर्शनीय बना देंगी.